सैफ का ब्लॉग: सवाल कीजिए इससे पहले कि आपका होना ही सवाल बन जाए

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सवाल करना सीखिए और गलत के खिलाफ बोलना भी। सवाल हर उस बारे में जो दिन रात आप को टीवी के माध्यम से परोसा जा रहा है। सवाल उस बारे में नहीं जो आपको बताया जा रहा है बल्कि सवाल उस बारे में जो आपको बता कर और दिखला कर समझाया जा रहा है। सवाल कीजिए इस से पहले कि शब्दों के अर्थ बदल दिए जाएं जो अभी भी बदले जा रहे हैं। सवाल कीजिए इससे पहले कि सवाल करना ही देशद्रोह बन जाए। सवाल कीजिए इससे पहले कि नफ़रत करना ही धर्म और दीन ईमान का हिस्सा बन जाए। सवाल कीजिए इससे पहले कि आपका होना ही सवाल बन जाए।
हाथरस में बलात्कार मामले में प्रशासन के कामकाज के ऊपर उठे सवाल को लेकर शुरू हुई बहस अब देशद्रोह पर आकर टिक गई है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने दावा किया है कि इस गैंगरेप की आड़ में राज्य में जातीय हिंसा और सांप्रदायिक दंगा फैलाने की अंतरराष्ट्रीय साजिश की जा रही है। वहीं इस मामले में प्रदेश में अनेक जगह देशद्रोह के केस दर्ज किए गए हैं और कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं। वैसे सीएए एनआरसी को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा को भी सरकार ने विदेशी ताकतों की साजिश बताया था। और इस तरह मूलभूत मुद्दों से हट कर बहस हिंसा और साजिशों पर आकर अटक गई थी।
मतलब अब बहस का मुद्दा ही बदल गया है। जहां बहस हिंदुस्तान में बढ़ते हुए रेप मामलों पर होनी चाहिए थी वो अब साजिशों में फंस कर रह गई है। अब आपके और हमारे सवाल ही बदल दिए हैं और जवाब उनका दिया जा रहा है जिनका सवाल ही मौजूद नहीं है।
सरकारों को लोगों के जागरूक होने पर क्यूं भरोसा नहीं है? क्यों उन्हें लगता है कि जनता में इतनी समझ नहीं है कि वो अपने मुद्दों पर सरकार का खुल कर विरोध कर सकें? क्या जनता इतनी बेवाकूफ़ है कि उसको कोई भी बहला फुसलाकर दंगा फसाद करवा सकता है? अगर ऐसा है तो फिर अतीत में हुए सारे चुनाव की भी जांच करवाई जाए कि कहीं कोई अंतरराष्ट्रीय साजिश तो नहीं हुई क्यूंकि सरकार बनवाने के लिए भी तो इसी जनता ने ही वोट दिया था या फिर यह सरकारों का नया हथकंडा है कि सवाल ही बदल दिए जाएं? बेशक अगर प्रदेश में इस तरह की कोई साजिश हो रही है तो सरकार अपराधियों को पकड़ कर सख्त कार्रवाई करे लेकिन साथ ही यह भी सुनश्चित करे कि इसकी आड़ में उन लोगों को निशाना ना बनाए जो पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए साफ उद्देश से लड़ रहे हैं। वरना लोकतांत्रिक अधिकारों को कोई मतलब नहीं रह जाएगा और जनता सरकार के प्रति अपना विरोध दर्ज कराने से भी डरेगी। इसीलिए सरकार को बाहर देखने के बजाय अपने गिरेबान में झांकना चाहिए कि वह क्यों नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने में नाकाम होती जा रही है। किसी भी वाजिब मुद्दों को साजिशों का नाम देकर भटकाया नहीं जा सकता है।
इसलिए लोकतंत्र में जनता के हर सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए और सवाल सिर्फ इतना ही है कि इतने सख्त कानून होने के बाद भी क्यों भारत में आए दिन बलात्कार के मामले सामने आते रहते हैं? क्यों आधी रात को बिना परिवार की मर्ज़ी के खिलाफ लड़की का दाह संस्कार किया गया? क्यों परिवार वालों को मीडिया से बात करने पर पाबंदी लगाई? क्यों पुलिस की भूमिका ज़्यादातर केस में संगिध रहती है? क्यों बलात्कारियों के समर्थन में सभाएं और रैलियां आयोजित हो जाती हैं?
सरकारों से इन सब सवालों के जवाब मांगिए लेकिन एक सवाल खुद से भी पूछिएगा कि कहीं आपको भी किसी अपराध को लेकर गुस्सा, अपराधी की धर्म और जाति देख कर तो नहीं आता। अगर जवाब हां है तो किसी अच्छे डॉक्टर को दिखा कर अपना इलाज करवाएं और हां संस्कार अपने बेटों को भी सिखाएं कि दूसरों की मां बहन की इज्जत अपनी मां बहन की तरह करें।

दूसरी तरफ आईटी सेल ने प्रोपेगंडा करना शुरू किया कि अपराध को जात पात या धर्म से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। बेशक यह बात बिल्कुल सही है लेकिन सरकारें भी सुनशचित करें के इस अधार पर अपराध भी नहीं हुआ करें। अपराधियों की एक प्रवती होती है कि वो अपने से कमजोर के खिलाफ अपराध करना ज़्यादा आसान समझता है। क्यों किसी नेता या ताकतवर इंसान के साथ ऐसी घटनाएं नहीं होती हैं? क्यूंकि अपराधियों को पता होता है कि अगर यहां कुछ किया तो बचपाना कठिन हो जाएगा। इसी मानसिकता के अधार पर ही दलित और समाज के पिछड़े वर्ग के खिलाफ अपराध और अत्याचारों में लगातार वृद्धि हो रही है। और अत्याचारियों को पता है कि यह कमज़ोर लोग है कुछ कर नहीं पाएंगे और अगर किसी कारणवश हम पकड़े भी गए तो सत्ता के शीर्ष पर हमारी ही जाती के लोग हैं वो बचा लेंगे। बहुत से केस तो ऐसे होते हैं जिसमें पुलिस ही पीड़िता पर समझौता करने का दवाब बना कर एफआईआर दर्ज करने से मना कर देती है क्यूंकि अत्याचारी समाज के रसूख वर्ग से आते हैं। और अगर कभी मीडिया में हाईलाइट होने के बाद कारवाई होती भी है तो फिर पीड़िता के ही किरदार और कैरेक्टर को ही शक के घेरे में खड़ा कर दिया जाता है और इतना प्रोपेगंडा होता है कि लोग ही शक करना शुरू कर देते हैं कि बलात्कार हुआ भी है या नहीं। और यहीं से बलात्कारियों के हौसले बुलंद हो जाते हैं वो फिर और किसी मासूम को अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए निकाल पढ़ते हैं।

सैफ जाफ़री

संपादक