आज़ादी के 73 सालों में कितना कुछ बदल पाया भारत ?

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कल हमें आज़ादी के 73 साल पूरे हो जाएंगे। कोरोना के दौर में जिस तरह त्यौहार मनाने के तरीकों में परिवर्तन आया है , ठीक उसी प्रकार ये परिवर्तन स्वतंत्र दिवस के दिन भी होना लाज़मी है। हम “डिजिटल इंडिया” के भारत में तो बहुत पहले ही प्रवेश कर चुके थे , लेकिन वायरस के दौर ने डिजिटल इंडिया को भाषणों से ज़्यादा लोगों के जीवन में जगह दे दी। महामारी के समय अब सबकुछ ऑनलाइन हो चुका है। बच्चों की पढ़ाई से लेकर “वर्क फ्रॉम होम”। ऐसा लगता है, मानो आज़ादी की जंग का उद्देश्य पूर्ण हो गया हो। लेकिन रुकिए, क्या वाकई हम आज़ादी के 73 साल बाद भी आज़ाद हो चुके है ?

अगर हाँ , तो फिर क्यों ट्रैफिक पर आज भी लाखों बच्चे कुछ न कुछ माँगते हुए दिखाई देते है। हर साल स्वतंत्र दिवस के एक दिन पहले ट्रैफिक सिग्नल पर छोटे-छोटे बच्चे और महिलाएं तिरंगों को बेचने के लिए दिखते है। देश का स्वाभिमान साथ होने के बावजूद भी उन्हें अपने स्वाभिमान को परे रखना पड़ता है। पेट के लिए इन तिरंगों को बेचने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। ट्रैफिक पर रुकती हर गाड़ी के करीब जाकर तिरंगे को बड़ी उम्मीद से आगे कर, ये आस लगाते है कि अबकी बार सामने से पूछा जाएगा “कितने का है” ? लेकिन ऐसा बहुत मुश्किल ही हो पाता है। कोई गाली देकर भगा देता है तो कोई मुँह मोड़कर आगे बढ़ जाता है। वहीं कुछ लोग ऐसे है जो खरीद तो लेते है, लेकिन महज़ एक दिन के बाद ही जब ये तिरंगा सड़क पर बिखरा हुआ नज़र आये तो अनदेखा कर निकल जाते है। जिस देश के लोगों को अभी तक अपने राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना ही नहीं आया हो , वे लोग आखिर कैसे आज़ाद हो सकते है। जिस देश में हालात आज भी गुलामी के हो , वहाँ कैसी आज़ादी ?

रिपोर्ट: मीनाक्षी